मदनमोहन मालवीय (अंग्रेज़ी: Madan Mohan Malaviya, जन्म- 25 दिसम्बर, 1861 ; मृत्यु- 12 नवम्बर, 1946)
महान स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ और शिक्षाविद ही नहीं, बल्कि एक बड़े समाज सुधारक भी थे। इतिहासकार वीसी साहू के अनुसार हिन्दू राष्ट्रवाद के समर्थक मदन मोहन मालवीय देश से जातिगत बेड़ियों को तोड़ना चाहते थे। उन्होंने दलितों के मन्दिरों में प्रवेश निषेध की बुराई के ख़िलाफ़ देशभर में आंदोलन चलाया। 24 दिसम्बर, 2014 को भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पंडित मदनमोहन मालवीय को मरणोपरांत देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से नवाजा।
संक्षिप्त परिचय :
बहुआयामी व्यक्तित्व। शिक्षाविद। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीरचयू) के संस्थापक। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी। हिन्दू महासभा के नेता।
25 दिसम्बर, 1861 को इलाहाबाद में जन्म। इलाहाबाद डिस्ट्रिक्ट स्कूल में शिक्षा के रूप में करियर शुरू करने के साथ पढ़ाई जारी रखी।
वकालत की पढ़ाई करने के बाद पहले ज़िला और बाद में हाई कोर्ट में प्रेक्टिस शुरू की। 1886 में नवगाठित कांग्रेस के कोलकाता में आयोजित दूसरे वार्षिक सत्र में प्रेरणादायक भाषण देकर राजनीतिक परिदृश्य में उभरे।
50 वर्षों तक कांग्रेस में सक्रिय रहे। 1909 (लाहौर), 1918 (दिल्ली), 1930 (दिल्ली) और 1932 (कोलकाता) में कांग्रेस अध्यक्ष रहे।
स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान उदारवादियों और राष्ट्रवादियों के बीच सेतु का काम किया।
1930 में जब गांधी जी ने नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया तो मदनमोहन मालवीय ने उसमें हिस्सा लिया और जेल गए।
50वीं वर्षगांठ पर देश सेवा के लिए वकालत छोड़ने का फैसला लिया।
1909 में इलाहाबाद से प्रभावी अंग्रेज़ी अखबार 'द लीडर' शुरू किया।
1903-18 के दौरान प्रांतीय विधायी परिषद और 1910-20 तक केंद्रीय परिषद के सदस्य रहे।
1916-18 के दौरान भारतीय विधायी सभा के निर्वाचित सदस्य रहे।
1931 में दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन द्वितीय में हिस्सा लिया
1937 में राजनीति से सन्न्यास लिया। सामाजिक मुद्दों के प्रति ध्यान केंद्रित किया।
महिलाओं की शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और बाल विवाह का विरोध किया।
12 नवम्बर, 1946 को निधन हो गया।
जीवन परिचय :
इलाहाबाद में 25 दिसम्बर, 1861 में जन्मे पंडित मदन मोहन मालवीय अपने महान कार्यों के चलते 'महामना' कहलाये। इनके पिता का नाम ब्रजनाथ और माता का नाम भूनादेवी था। चूँकि ये लोग मालवा के मूल निवासी थे, इसीलिए मालवीय कहलाए। महामना मालवीय जी ने सन् 1884 में उच्च शिक्षा समाप्त की। शिक्षा समाप्त करते ही उन्होंने अध्यापन का कार्य शुरू किया पर जब कभी अवसर मिलता वे किसी पत्र इत्यादि के लिये लेखादि लिखते। 1885 ई. में वे एक स्कूल में अध्यापक हो गये, परन्तु शीघ्र ही वक़ालत का पेशा अपना कर 1893 ई. में इलाहाबाद हाईकोर्ट में वक़ील के रूप में अपना नाम दर्ज करा लिया। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी प्रवेश किया और 1885 तथा 1907 ई. के बीच तीन पत्रों- हिन्दुस्तान, इंडियन यूनियन तथा अभ्युदय का सम्पादन किया।
शिक्षा : मदनमोहन मालवीय की प्राथमिक शिक्षा इलाहाबाद के ही श्री धर्मज्ञानोपदेश पाठशाला में हुई जहाँ सनातन धर्म की शिक्षा दी जाती थी । इसके बाद मालवीयजी ने 1879 में इलाहाबाद ज़िला स्कूल से एंट्रेंस की परीक्षा उत्तीर्ण की और म्योर सेंट्रल कॉलेज से एफ.ए. की। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण मदनमोहन को कभी-कभी फ़ीस के भी लाले पड़ जाते थे। इस आर्थिक विपन्नता के कारण बी.ए. करने के बाद ही मालवीयजी ने एक सरकारी विद्यालय में 40 रुपए मासिक वेतन पर अध्यापकी शुरू कर दी।
विवाह : मदन मोहन मालवीय का विवाह मीरजापुर के पं. नन्दलाल जी की पुत्री कुन्दन देवी के साथ 16 वर्ष की आयु में हुआ था।[1]
राजनीतिक जीवन :
जीवनकाल के प्रारम्भ से ही मालवीय जी राजनीति में रुचि लेने लगे और 1886 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में सम्मिलित हुए। मालवीय जी दो बार 1909 तथा 1918 ई. में कांग्रेस के अध्यक्ष हुए। 1902 ई. में मालवीय जी उत्तर प्रदेश 'इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल' के सदस्य और बाद में 'सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली' के सदस्य चुने गये। मालवीय जी ब्रिटिश सरकार के निर्भीक आलोचक थे और उन्होंने पंजाब की दमन नीति की तीव्र आलोचना की, जिसकी चरम परिणति जलियांवाला बाग़ काण्ड में हुई। वे कट्टर हिन्दू थे, परन्तु शुद्धि (हिन्दू धर्म को छोड़कर दूसरा धर्म अपना लेने वालों को पुन: हिन्दू बना लेते) तथा अस्पृश्यता निवारण में विश्वास करते थे। वे तीन बार हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गये। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि 1915 ई. में 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' की स्थापना है। विश्वविद्यालय स्थापना के लिए उन्होंने सारे देश का दौरा करके देशी राजाओं तथा जनता से चंदा की भारी राशि एकत्रित की।
सम्पादक :
बालकृष्ण भट्ट के हिन्दी प्रदीप में हिन्दी के विषय में उन्होंने उन दिनों बहुत कुछ लिखा सन् 1886 ई. में कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन के अवसर पर कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह से उनका परिचय हुआ तथा मालवीय जी की भाषा से प्रभावित होकर राजा साहब ने उन्हें दैनिक 'हिन्दुस्तान' का सम्पादक बनने पर राजी कर लिया। मालवीय जी के लिए यह एक यशस्वी जीवन का शुभ श्रीगणेश सिद्ध हुआ।
रचनाएँ :
अभ्युदय
अभ्युदय (साप्ताहिक पत्र)
सन 1905 ई. में मालवीय की हिन्दू विश्वविद्यालय की योजना प्रत्यक्ष रूप धारण कर चुकी थी। इसी के प्रचार की दृष्टि से उन्होंने 1907 ई. में 'अभ्युदय' की स्थापना की। मालवीय जी ने दो वर्ष तक इसका सम्पादन किया। प्रारम्भ में यह पत्र साप्ताहिक रहा, फिर सन् 1915 ई. से दैनिक हो गया।
लीडर और हिन्दुस्तान टाइम्स
लीडर (समाचार पत्र)
'लीडर' और 'हिन्दुस्तान टाइम्स' की स्थापना का श्रेय भी मालवीय जी को ही है। 'लीडर' के हिन्दी संस्करण 'भारत' का आरम्भ सन् 1921 में हुआ और 'हिन्दुस्तान टाइम्स' का हिन्दी संस्करण 'हिन्दुस्तान' भी वर्षों से निकल रहा है। इनकी मूल प्रेरणा में मालवीय जी ही थे।
मर्यादा
मर्यादा (पत्रिका)
'लीडर' के एक वर्ष बाद ही मालवीय जी ने 'मर्यादा' नामक पत्रिका निकलवाने का प्रबन्ध किया था। इस पत्र में भी वे बहुत दिनों तक राजनीतिक समस्याओं पर निबन्ध लिखते रहे। यह पत्रिका कुछ दिनों तक ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी से प्रकाशित होती रही।
सनातन धर्म
सन 1906 ई. में इलाहाबाद के कुम्भ के अवसर पर उन्होंने सनातन धर्म का विराट अधिवेशन कराया, जिसमें उन्होंने 'सनातन धर्म-संग्रह' नामक एक बृहत ग्रंथ तैयार कराकर महासभा में उपस्थित किया। कई वर्ष तक उस सनातन धर्म सभा के बड़े-बड़े अधिवेशन मालवीय जी ने कराये। अगले कुम्भ में त्रिवेणी के संगम पर इनका सनातन धर्म सम्मेलन भी इस सभा से मिल गया। सनातन धर्म सभा के सिद्धांतों के प्रचारार्थ काशी से 20 जुलाई, 1933 ई. को मालवीय जी की संरक्षता में 'सनातन धर्म' नामक साप्ताहिक पत्र भी प्रकाशित होने लगा और लाहौर से मिश्रबन्धु निकला यह सब मालवीय जी के प्रयत्नों का ही फल था।
अन्य पत्रों को भी मालवीय जी सदा सहायक करते रहे। वे पत्रों द्वारा जनता में प्रचार करने में बहुत विश्वास रखते थे। और स्वयं वर्षों तक कई पत्रों के सम्पादक रहे। पत्रकारिता के अतिरिक्त वे विविध सम्मेलनों, सार्वजनिक सभाओं आदि में भी भाग लेते रहे। कई साहित्यिक और धार्मिक संस्थाओं से उनका सम्पर्क हुआ तथा उनका सम्बन्ध आजीवन बना रहा। इसके अतिरिक्त 'सनातन धर्म सभा' के नेता होने के कारण देश के विभिन्न भागों में जितने भी सनातन धर्म महाविद्यालयों की स्थापना हुई, वह मालवीय जी की सहायता से ही हुई। इनमें कानपुर, लाहौर, अलीगढ़, आदि स्थानों के सनातन धर्म महाविद्यालय उल्लेखनीय हैं।
हिन्दी के विकास में योगदान :
मालवीय जी एक सफल पत्रकार थे और हिन्दी पत्रकारिता से ही उन्होंने जीवन के कर्मक्षेत्र में पदार्पण किया। वास्तव में मालवीय जी ने उस समय पत्रों को अपने हिन्दी-प्रचार का प्रमुख साधन बना लिया और हिन्दी भाषा के स्तर को ऊँचा किया था। धीरे-धीरे उनका क्षेत्र विस्तृत होने लगा। पत्र सम्पादन से धार्मिक संस्थाएँ और इनसे सार्वजनिक सभाएँ विशेषकर हिन्दी के समर्थनार्थ और यहाँ से राजनीति की ओर इस क्रम ने उनसे सम्पादन कार्य छुड़वा दिया और वे विभित्र संस्थाओं के सदस्य, संस्थापक अथवा संरक्षक के रूप में सामने आने लगे। पत्रकार के रूप में उनकी हिन्दी सेवा की यही सीमा है, यद्यपि लेखक की हैसियत से वे भाषा और साहित्य की उत्रति के लिए सदा प्रयत्नशील रहे। हिन्दी के विकास में उनके योगदान का तब दूसरा अध्याय आरम्भ हुआ।
हिन्दी की सबसे बड़ी सेवा मालवीय जी ने यह की कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की अदालतों और दफ़्तरों में हिन्दी को व्यवहार योग्य भाषा के रूप में स्वीकृत कराया। इससे पहले केवल उर्दू ही सरकारी दफ़्तरों और अदालतों की भाषा थी। यह आन्दोलन उन्होंने सन् 1890 ई. में आरम्भ किया था। तर्क और आँकडों के आधार पर शासकों को उन्होंने जो आवेदन पत्र भेजा उसमें लिखा कि “पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध की प्रजा में शिक्षा का फैलना इस समय सबसे आवश्यक कार्य है और गुरुतर प्रमाणों से यह सिद्ध किया जा चुका है कि इस कार्य में सफलता तभी प्राप्त होगी जब कचहरियों और सरकारी दफ़्तरों में नागरी अक्षर जारी किये जायेंगे। अतएव अब इस शुभ कार्य में जरा-सा भी विलम्ब न होना चाहिए। सन् 1900 ई. में गवर्नर ने उनका आवेदन पत्र स्वीकार किया और इस प्रकार हिन्दी को सरकारी कामकाज में हिस्सा मिला। 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' के कुलपति की स्थिति में उपाधिवितरणोंत्सवों पर प्राय: मालवीय जी हिन्दी में ही भाषण करते थे। शिक्षा के माध्यम के विषय में मालवीय जी के विचार बड़े स्पष्ट थे। अपने एक भाषण में उन्होंने कहा था कि भारतीय विद्यार्थियों के मार्ग में आने वाली वर्तमान कठिनाईयों का कोई अंत नहीं है। सबसे बड़ी कठिनता यह है कि शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा न होकर एक अत्यंत दुरुह विदेशी भाषा है। सभ्य संसार के किसी भी अन्य भाग में जन-समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।
हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान :
लोकमान्य तिलक, राजेन्द्र बाबू, और जवाहरलाल नेहरू के मौलिक या अनुदित साहित्य की तरह मालवीय जी की रचनाओं से हिन्दी की साहित्य निधि भरित नहीं हुई। इसलिए उनके सम्पूर्ण कृतित्व को आँकते हुए यह मानना होगा कि हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में मालवीय जी का योगदान क्रियात्मक अधिक है, रचनात्मक साहित्यकार के रूप में कम है। महामना मालवीय जी अपने युग के प्रधान नेताओं में थे। जिन्होंने हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान को सर्वोच्च स्थान पर प्रस्थापित कराया।
मृत्यु :
मालवीय जी आजीवन देश सेवा में लगे रहे और 12 नवम्बर, 1946 ई. को इलाहाबाद में उनका निधन हो गया।
    
           
   
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