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द्वैध प्रशासनिक प्रणाली क्या है ?

द्वैध प्रशासनिक प्रणाली के अन्तर्गत प्रांतीय विषयों को दो भागों में बांट दिया गया- आरक्षित (Reserved) और हस्तांतरित (Transferred)। आरक्षित विषयों का प्रशासन गवर्नर अपने उन पार्षदों की सहायता से करता था जिन्हें वह मनोनीत करता था और वे विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं थे। 
हस्तांतरित विषयों का प्रशासन गवर्नर उन मंत्रियों की सहायता से करता था जिन्हें वह निर्वाचित सदस्यों में से नियुक्त करता था। ये लोग सदन के प्रति उत्तरदायी थे, परन्तु गवर्नर की इच्छा पर ही पदों पर बने रह सकते थे। सपरिषद राज्य सचिव तथा सपरिषद गवर्नर जनरल को इन विषयों में हस्तक्षेप करने का अधिकार बहुत सीमित था। परन्तु आरक्षित विषयों में यह अधिकार पूर्ववत बना रहा।

द्वैध शासन के अंतर्गत नियम


शासन का सिद्धांत प्रांतीय सरकार की कार्यकारी शाखा को अधिकारिक और लोकप्रिय रूप से जिम्मेदार वर्गों में विभाजन को मान्यता देता है। ब्रिटिश भारत के प्रांतों के लिए द्वैध शासन भारत सरकार अधिनियम 1919 द्वारा प्रारंभ किया गया था।









बंगाल में द्वैध शासन किसने लागू किया

द्वैध शासन बंगाल में 1765 ई. की इलाहाबाद सन्धि के अंतर्गत लगाया गया था। यह शासन बंगालके अतिरिक्त बिहार और उड़ीसा में भी लागू किया गया था। सन्धि के फलस्वरूप एक ओर ईस्ट इण्डिया कम्पनी और दूसरी ओर अवध के नवाब शुजाउद्दौला, बंगाल के नवाब मीर कासिम और दिल्ली के सम्राट शाहआलम द्वितीय के बीच युद्ध का अन्त हो गया।इस अधिनियम द्वारा केंद्र एवं प्रान्तों के बीच विषयों का बँटवारा किया गया और जो विषय भारत के हित में थे, उन्हें केन्द्रीय सरकार के अधीन रखा गया। प्रतिरक्षा, यातायात, विदेश नीति, सीमा शुल्क, मुद्रा, सार्वजनिक ऋण इत्यादि को केन्द्रीय विषय में सम्मिलित किया गया। स्थानीय स्वशासन सार्वजनिक, स्वास्थ्य, सफाई और शिक्षा, पुलिस, जेल तथा सहकारिता आदि को प्रांतीय विषय के अधीन रखा गया।


`द्वैध प्रशासनिक प्रणाली क्या है ?-नियम


द्वैध शासन असफल रहा जिसके कई कारण थे। यह गलत सिद्धान्त पर आधारित था और प्रांतीय विषयों का विभाजन दोषपूर्ण था। गवर्नर को कोई वास्तविक अधिकार नहीं दिया गया था। प्रांतीय सरकार को हमेशा वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था और सुधारों के प्रति हमेशा ब्रिटिश सरकार की उदासीन नीति के कारण द्वैध शासन सफल नहीं हो सका। इस व्यवस्था में सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना का पूर्णतया अभाव था और मंत्री तथा लोकसेवकों के बीच बराबर तनावपूर्ण सम्बन्ध बना रहता था। इस प्रकार आंशिक उत्तरदायी शासन यानी द्वैध शासन हर दृष्टिकोण से असफल रहा। यह एक अधूरी योजना थी जो भारत के लिए एक मजाक का विषय ही बनी रही। इसने खुद सरकार के अन्दर ही कई मतभेद पैदा कर दिए।

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